bismillah

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इस्लाम की मेरी अविश्वसनीय खोज

हाल ही में जब किसी ने मुझसे पूछा कि मैंने इस्लाम कैसे कबूल कर लिया तो मैं थोड़ी चकित और अचंभित हो गयी। मैंने कभी भी इस्लाम धर्म अपनाने के बारे में नहीं सोचा था। मैंने पहली बार कैथोलिक धर्म पर कब सवाल उठाया था? पहली बार मुझे कब मुस्लिम बनने की इच्छा हुई थी? इन सवालों और कई अन्य सवालों के जवाब देने के लिए इतना ज्यादा सोचने की जरुरत है जितना मैं कभी सोच भी नहीं सकती। इन सवालों के जवाब देने के लिए मुझे बिल्कुल शुरुआत से शुरू करना होगा ताकि आप मेरे जीवन के उस बिंदु को समझ सकें जहाँ आखिरकार मैंने इस्लाम के सच को कबूल किया। मैं 67 साल की उम्र में मुस्लिम बनी और अल्लाह का शुक्र है कि उसने मुझे इस्लाम को मानने वाला बनाया। "अल्लाह जिसे हिदायत देना चाहता है, उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है। और जिसको चाहता है कि गुमराह करे, उसका सीना तंग भींचा हुआ (निहायत तंग) कर देता है, जैसे कि वो जोर से (बमुश्किल) आसमान पर चढ़ रहा है: इसी तरह अल्लाह उन लोगों पर अज़ाब डालेगा जो ईमान नहीं लाते।" (क़ुरान 6: 125)

मैं एक कट्टर कैथोलिक घर में पली-बढ़ी थी, मैं तीन बच्चों में मँझली थी। मेरे पिता प्रतिदिन बहुत कठिन परिश्रम करते थे। वो हर दिन सुबह जल्दी घर से चले जाते थे और रात में बहुत देर से आते थे। वो ऐसा इसलिए करते थे ताकि मेरी माँ घर पर रहकर मेरी और मेरी बहनों की देखभाल कर सकें। एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण दिन मेरी माँ ने हमें बताया कि मेरे पिता कार दुर्घटना की चपेट में आ गए हैं। वो अचानक गुजर गए और हमारी पूरी दुनिया बिखर गयी। सभी बदलावों के बीच एक दिन मेरी माँ ने बताया कि अब उन्हें वापस काम पर जाना होगा। मेरी माँ जो पहले एक नर्स थीं उन्हें हमारी देखभाल करने के लिए दोबारा काम पर जाना पड़ा। उन्हें एक स्थानीय अस्पताल में नौकरी मिल गयी, कई बार वो दो शिफ्ट में काम करती थीं। लेकिन अपनी नयी जिम्मेदारी की वजह से मेरी माँ अब हमारी परवरिश पर ध्यान देने में समर्थ नहीं थीं। और यद्यपि उन्होंने हमें एक कैथोलिक स्कूल भेज दिया लेकिन अपनी नौकरी की वजह से वो अपनी बेटियों पर ठीक प्रकार से ध्यान नहीं दे पायीं।

इसलिए, ज्यादातर समय बिताने के लिए मैंने एक स्थानीय कैफ़े में अपने दोस्तों के साथ समय व्यतीत करना शुरू कर दिया। वहीं पर मैं एक बहुत अच्छे मुस्लिम आदमी से मिली जो बाद में मेरे शौहर बनें। मेरी माँ को नहीं पता था कि मैं इस आदमी के साथ समय बिता रही हूँ। दरअसल, जब मैंने उन्हें बताया कि मैं किसी से प्यार करती हूँ और शादी करना चाहती हूँ तो उन्होंने मुझे चेतावनी दी कि हम बिल्कुल अलग-अलग पृष्ठभूमि के हैं और कभी ना कभी इसके कारण हमें समस्या आएगी। उन्होंने बताया कि भविष्य में यदि हमारे बच्चे होते हैं तो निश्चित रूप से धर्म को लेकर हमारे बीच में परेशानियां आएँगी। बीस साल की उम्र में मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि हमारी शादी में कोई परेशानी आएगी। मैं बिल्कुल प्यार में थी और इस बात को लेकर बहुत खुश थी कि कोई मेरी देखभाल करेगा। उस समय मेरे शौहर उतने धार्मिक इंसान नहीं थे, और कहीं ना कहीं मैं सोच रही थी कि मैं उन्हें कैथोलिक धर्म में बदलने के लिए मना लूंगी। हमारे एक ही धार्मिक पृष्ठभूमि का ना होने की वजह से मैं अपने आपको ज्यादा खुले विचारों वाला मानती थी और नयी सभ्यता को अपनाने के लिए बेहद उत्साहित थी।

अगले कुछ सालों तक सबकुछ बिल्कुल ठीक प्रकार से चलता रहा। हम खुश थे और संस्कृति या धर्म की वजह से हमें एक बार भी कोई परेशानी नहीं हुई। अल्लाह ने हमें एक खूबसूरत बेटा दिया और इसके कुछ सालों बाद एक खूबसूरत बेटी दी। फिर भी, हमारा जीवन ठीक प्रकार से चलता रहा और मैंने बच्चों को अपने साथ चर्च ले जाना भी शुरू कर दिया। मेरे पति ने कभी भी मुझे रविवार के धर्मसमाज में जाने से नहीं रोका। हालाँकि, कुछ समय तक हमारे बच्चों को चर्च ले जाने के बाद उन्होंने एक दिन मुझे बोला कि वो नहीं चाहते कि बच्चे चर्च जाएँ। ज़ाहिर है, मैं बहुत गुस्सा और परेशान हुई। मैंने कहा, "लेकिन क्यों नहीं"। "कोई भी धर्म ना होने से एक धर्म होना बेहतर है," मैंने दलील दी। चर्च ले जाने में क्या नुकसान था सचमुच मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था। अब तक हमने कभी भी धर्म को लेकर बात नहीं की थी। दरअसल, मैंने कभी इस बारे में नहीं सोचा कि कैथोलिक धर्म के अलावा भी कोई अन्य धर्म हो सकता है। मैं पैदाइशी कैथोलिक थी और कैथोलिक धर्म को ही सही धर्म मानती थी। वे बातें जिनपर मैं उंगली भी नहीं उठा सकती, उस दिन के बाद से ये प्रतीत होने लगी थीं, अब बहुत सारी समस्याएं सामने थीं। हम हमेशा लड़ते रहते थे – हर चीज को लेकर, सबको लेकर। अब, छोटी चीजें भी बड़ी बनने लगी थीं। धर्म हमारे बीच झगड़े की वजह बन गया था। हमारी संस्कृतियों का अंतर अब बहस का मुद्दा बन गया था। हम ससुराल को लेकर लड़ते थे और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह थी कि हम अपने बच्चों की परवरिश को लेकर भी बहस करते थे। मेरी माँ ने मुझे जिन चीजों के बारे में सचेत किया था वो अब सच हो रही थीं।

मेरे शौहर के पिता, मेरे ससुर का हमारी शादी को लेकर जो समझ, ईमानदारी, चिंता और प्यार था अब वो हमारे बीच की एकमात्र शांति और सामंजस्य था। मेरे ससुर अपने बेटे और पोते-पोती से बहुत प्यार करते थे लेकिन वे मुझे भी अपनी बेटी की तरह ही प्यार करते थे। वह बहुत धार्मिक और सच्चे मुस्लिम थे एवं बेहद समझदार इंसान भी थे। उस समय, क्योंकि मुझे इस्लाम के बारे में ज्यादा नहीं पता था तो अपने ससुर की वजह से ही पहली बार मेरा परिचय इस्लाम से हुआ। वो हर एक नमाज़ पढ़ते थे, रमज़ान के महीने में रोज़ा रखते थे और गरीबों के प्रति बेहद उदार थे। अल्लाह के साथ मैं उनके जुड़ाव को महसूस कर सकती थी। असल में, मेरे ससुर जरूरतमंदों के प्रति इतने उदार थे कि हर दिन मस्जिद से दोपहर की नमाज़ पढ़कर घर आने के बाद वो किसी जरूरतमंद को घर पर साथ में खाना खाने के लिए बुला लिया करते थे। यह हर दिन होता था। 95 साल की उम्र में उनकी मौत से पहले तक, रिश्तेदार बताते हैं कि उन्होंने अपनी इस आदत को जारी रखा था।

मेरे ससुर को हमारा झगड़ा करना बिल्कुल पसंद नहीं था और उन्होंने हमें जल्दी ही इसका कोई हल निकालने की सलाह भी दी ताकि इसकी वजह से हमारे बच्चों को कोई कष्ट ना हो। उन्होंने पूरी संजीदगी से इसका हल ढूंढने में हमारी मदद करने की कोशिश की। उन्होंने अपने बेटे से मुझे अपने धर्म का पालन करने देने के लिए भी कहा, लेकिन अब यह केवल धर्म के बारे में नहीं रह गया था। मैं बिल्कुल हताश हो गयी थी और इन सब चीजों से छुटकारा पाना चाहती थी। जब मैंने अपने पति से अलग होने की बात की तो वो मान गए कि हमारी शादी के लिए शायद यही सबसे सही चीज थी। आपको वो कहावत पता होगी कि, "दूरी दिलों को मिला देती है।" खैर, हमारे मामले में ऐसा नहीं हुआ। दरअसल, इस दूरी ने हमारे दिलों के बीच की दूरी को और भी ज्यादा बढ़ा दिया। अलग होने के बाद, हम दोनों हमेशा के लिए अलगाव चाहते थे और हमने तलाक लेने का फैसला किया। हालाँकि, मैं अपने बच्चों को अपने पास रखना चाहती थी लेकिन हम दोनों को लगा कि उनका अपने पिता के पास रहना ही बेहतर होगा। वो आर्थिक रूप से ज्यादा बेहतर स्थिति में थे और उनका ठीक प्रकार से पालन पोषण कर सकते थे और उन्हें आराम की ज़िन्दगी दे सकते थे; जिसके लिए मैं तैयार नहीं थी। मैं उन्हें हर रात याद करती थी। मैं अपनी माँ के पास वापस चली गयी और हर सप्ताहांत पर मैंने अपने बच्चों से मिलना जारी रखा। मेरे पहले शौहर हमारे बच्चों को शुक्रवार की दोपहर में मेरे पास छोड़ देते थे और रविवार की सुबह जल्दी ही साथ लेकर चले जाते थे। हालाँकि इस व्यवस्था से मुझे बेहद तकलीफ होती थी, यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।

हर रात सोने से पहले मैं बाइबिल पढ़ा करती थी। जब मेरे बच्चे मुझसे मिलने आते थे तो मैं उन्हें बाइबिल के अनुच्छेद पढ़कर सुनाती थी चाहे वे इसे समझे या ना समझे। अनुच्छेद पढ़ने के बाद, एक रात मैं यीशु से मदद मांगती थी, अगली रात देवदूतों से, उसके अगली रात विभिन्न संतों से, उसके अगली रात मदर मैरी से। एक रात मेरे पास मदद मांगने के लिए कोई नहीं था, मेरे पास कोई संत नहीं बचे थे। तब मैंने कहा 'अब हम परमेश्वर से मदद मागेंगे।' मेरे बेटे ने कहा 'ठीक है, परमेश्वर कौन हैं?' मैंने कहा 'जिसने तुम्हें बनाया, जिसने मुझे बनाया। वो हमेशा हमारे पास रहता है'। तो वह सोचने लगा, वो मेरी बातों के बारे में सोच रहा था। अपने स्पष्टीकरण के लिए, मैंने अपना क्रॉस दोबारा रगड़ा। मैंने कहा 'अब परमेश्वर को धन्यवाद कहो।' उसने मेरे क्रॉस को देखकर पूछा 'माँ, यह कौन है?' मैंने कहा 'यह परमेश्वर हैं। यह परमेश्वर के बेटे थे'। उसने कहा 'आपने एक मिनट पहले ही मुझे बताया कि परमेश्वर अनंत हैं। फिर ये कैसे मर गए?' मैंने अपने पूरे जीवन में कभी भी इस तथ्य के बारे में नहीं सोचा था। उसने मुझसे पूछा यह परमेश्वर कहाँ से आये हैं? और मैंने कहा, यह कुंवारी मैरी की कोख से पैदा हुए थे। उसने कहा 'ओह, तो इनका पहले जन्म हुआ था।' मैंने कहा 'हाँ'। लेकिन इसके बाद उसने कहा 'लेकिन आपने बोला कि वो अनंत हैं'। वो कभी नहीं मरते ना ही पैदा होते हैं। मेरा बेटा, जो अब लगभग आठ साल का था, उसने मुझसे सीधे कहा, "माँ, आप अल्लाह से मदद क्यों नहीं मांगती?" मैं हैरान और अवाक रह गयी थी और थोड़ी चकित भी थी कि वो मेरे धर्म पर सवाल उठा रहा था। मैंने उससे कहा कि मैं अल्लाह से भी मदद मांगती हूँ। मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि मेरा यह बेटा बड़ा होकर हमेशा मुझे इस बात कि याद दिलाएगा कि मुझे उस सच्चे अल्लाह की इबादत करने की जरुरत है। अल्लाह का शुक्र है।

कुछ सालों बाद आखिरकार मैंने दूसरी शादी कर ली और अपने नए शौहर के साथ ऑस्ट्रेलिया में बस गयी। मेरे पहले शौहर सऊदी अरब जाकर बस गए। मैं अपने बच्चों से मिलना चाहती थी लेकिन अंत में मैंने इटली में अपना नया परिवार शुरू किया एवं तीन और बेटियों की माँ बनी। फिर भी मैं हर एक रात प्रार्थना किया करती थी, "पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर।" साल तेजी से और व्यस्तता के साथ बीतते गए। एक गर्मी में मैं बहुत उत्साहित थी; मेरा बेटा और बेटी मुझसे मिलने आने वाले थे। मेरे दिमाग में बहुत सी बातें चल रही थीं। क्या इतने वक्त के बाद मुझे देखकर वे खुश होंगे? हम किस बारे में बात करेंगे? मैंने मदद के लिए प्रार्थना की। लेकिन जब मैंने पहली बार अपने बच्चों को एयरपोर्ट पर देखा तो मेरा सारा डर दूर हो गया। माँ और बच्चों के बीच एक गहरा रिश्ता होता है जो कुछ समय साथ ना रहने पर भी बना रहता है। मेरे दोनों बच्चों में से मेरा बेटा ज्यादा स्पष्टवादी था। वह मुझे इस बात की याद दिलाना नहीं भूला कि वे सूअर नहीं खाते और ना ही वे शराब वाली चीजें खा सकते हैं। मैंने उससे कहा कि मुझे उसके धर्म के बारे में याद है। मैंने उससे बताया कि मैं भी सूअर नहीं खाती और ना ही शराब पीती हूँ, उसके पिता से शादी करने के बाद से ही ये आदतें मुझसे जुड़ गयी थीं जो अभी तक बदली नहीं थीं। खैर, वाइन के लिए मैंने इस बात का ध्यान रखा कि जब वे मेरे साथ घर पर हों तो मैं खाना बनाते समय इसका प्रयोग ना करूँ।

एक दूसरे को जानते हुए, उनकी नयी बहनों से उनकी पहचान कराते हुए, पिकनिक करने में, बाहर घूमने में और तैराकी करते हुए हमने एक साथ बहुत अच्छा समय बिताया। मैं नहीं चाहती थी कि ये खत्म हो। लेकिन मुझे पता था कि सऊदी अरब में उनका अपना एक जीवन है और उन्हें वापस जाने की जरुरत पड़ेगी। मैंने अपनी बेटी से एक चिंताजनक सवाल पूछा कि उसकी सौतेली माँ उसके साथ कैसा व्यवहार करती है, और जब उसने मुझे बताया कि वो उसे एक बेटी की तरह मानती है तो वास्तव में मुझे बेहद ख़ुशी हुई।

उस गर्मी के बाद मेरे बच्चे एक साथ दो बार और मुझसे मिलने आए। जब मेरा बेटा 21 साल का हुआ तो वो मेरे साथ 6 महीने के लिए रहने आया। हम धर्म को लेकर बहस किया करते थे! मेरा और मेरे बेटे का व्यक्तित्व काफी हद तक एक समान है, लेकिन हम दोनों में कुछ असमानताएं भी हैं – और वे बिल्कुल स्पष्ट हैं। बहस में मैं बहुत ज्यादा गुस्से वाली हूँ जबकि मेरा बेटा बिल्कुल शांत स्वभाव का है, इसलिए जब भी मैं गुस्से से पागल हो जाती हूँ तो वो शांति बनाए रखता है! इस टकराव के बावजूद, मुझे लगता है कि ये हमारे पक्ष में काम करता है क्योंकि हम अपनी चर्चा में संतुलन बना लेते हैं। हम दोनों ही प्रेमपूर्ण, उदार और मददगार लोग हैं। जो बात मुझे अपने बेटे के बारे में सबसे ज्यादा पसंद है वो यह कि वह जो कुछ भी करता है उसके प्रति समर्पित रहता है। वो एक अच्छा और शरीफ इंसान है, लेकिन वो बहुत मजबूत सिद्धांतों वाला है और जो भी एक बार सोच लेता है उसे जरूर पूरा करता है, जिसकी मैं बहुत इज्जत करती हूँ। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना आपा ना खोने की उसकी इस क्षमता को मैं बहुत सराहती हूँ। वो बहुत तार्किक है और किसी एक समस्या के ऊपर ज्यादा देर तक ध्यान केंद्रित नहीं करता है। जितना संभव हो सके वो समस्याओं को हल करने की और परिस्थितियों को सुधारने की कोशिश करता है। मैं लगातार यह प्रार्थना किया करती थी कि मेरा बेटा कैथोलिक धर्म में परिवर्तित होने के लिए राज़ी हो जाए। मैं पूरे दिल से चाहती थी कि वो एक पादरी बन जाए – मुझे लगता था कि वो एक बहुत अच्छा धर्मोपदेशक बनेगा। वो एक बहुत अच्छा लड़का था और अल्लाह से डरने वाला था। जो पादरी बनने के लिए अच्छी योग्यता होती है। एक बार जब मैंने उससे कहा कि वो एक बहुत अच्छा पादरी बन सकता है तो मेरे बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा कि उसके कैथोलिक पादरी बनने से ज्यादा उसकी माँ के मुस्लिम बनने की सम्भावना है।

6 महीने के बाद, यद्यपि, मेरे बेटे ने संयुक्त राज्य जाने की इच्छा ज़ाहिर की। अंत में, वो अमेरिका जाकर बस गया और उसने मियामी, फ्लोरिडा में घर बसा लिया। इसी दौरान, मैं विधवा हो गयी और मेरे साथ घर में केवल एक किशोर बेटी बची। मेरा बेटा चाहता था कि मैं उसके साथ अमेरिका में रहूँ, इसलिए मैं अपनी 17 साल की बेटी के साथ अमेरिका चली गयी। हमें अमेरिका बहुत पसंद आया और जल्दी ही मेरी बेटी ने वहां अपना जीवन बनाना शुरू कर दिया। मेरे और मेरे बेटे के बीच कुछ नहीं बदला था–हमने कैथोलिक धर्म और इस्लाम के बारे में बात करना जारी रखा और हममें से कोई भी हार मानने के लिए तैयार नहीं था। कभी-कभी जब ट्रिनिटी का विषय उठता था और मुझे कोई जवाब नहीं मिलता था या मैं उसकी बातों से इंकार नहीं कर पाती थी तो मैं बस अपना हाथ खड़ा करके चली जाती थी। जब भी मैं उसे अपने धर्म पर हमला करते हुए देखती थी तो मुझे बहुत गुस्सा आता था।

मैंने पूछा, "तुम बाकी सब लोगों की तरह क्यों नहीं हो सकते"। "दूसरे मुस्लिम मुझे स्वीकार करते हैं और मुझे बदलने की कोशिश नहीं करते हैं।" उसने जवाब दिया, "मैं दूसरों जैसा नहीं हूँ।" "मैं आपसे प्यार करता हूँ। मैं आपका बेटा हूँ और चाहता हूँ कि आप ज़न्नत में जाएँ।" मैंने उससे कहा कि मैं ज़न्नत जाउंगी–मैं एक सच्ची और ईमानदार औरत हूँ, मैं झूठ नहीं बोलती, चोरी नहीं करती या धोखा नहीं देती।" मेरे बेटे ने जवाब दिया, "ये चीजें इस दुनिया में जरुरी और मददगार होती हैं, बहरहाल क़ुरान में कई बार बताया गया है कि अल्लाह कामचोर (बहुदेववाद) को माफ़ नहीं करता है। क़ुरान कहता है कि वो एकमात्र चीज जो अल्लाह माफ़ नहीं करेगा वो है उसके साथ साथियों को जोड़ना, लेकिन बाकी वो जिसे भी चाहे माफ़ कर देता है।" उसने मुझे इस्लाम के बारे में पढ़ने, सीखने और खोजने का आग्रह किया। वो मेरे लिए किताबें खरीद कर लाया ताकि मैं इसे समझ सकूँ। लेकिन मैंने मना कर दिया। मैं कैथोलिक पैदा हुई थी और कैथोलिक ही मरूंगी।

अगले 10 सालों तक मैं अपने बेटे, उसकी बीबी और परिवार के पास ही रही। हालाँकि, मेरी इच्छा थी कि मैं अपनी बेटी के साथ भी थोड़ा समय बिताऊं जो अभी भी सऊदी अरब में ही रह रही थी। वहां जाने के लिए वीज़ा मिलना आसान नहीं था। मेरे बेटे ने मुझसे मज़ाक में कहा कि यदि मैं केवल इस्लाम कबूल कर लेती तो सऊदी अरब जाने के लिए वही मेरा वीज़ा होता; तब मुझे उमरा वीज़ा (तीर्थयात्रा के लिए मक्का, सऊदी अरब का वीज़ा) मिल सकता था। मैंने कठोरतापूर्वक उससे कहा कि मैं मुस्लिम नहीं हूँ। बहुत कठिन परिश्रम और थोड़े संपर्कों के बाद अपनी बेटी से मिलने के लिए मुझे यात्री वीज़ा मिल गया, मेरी बेटी अब तीन बच्चों की माँ थी। जाने से पहले मेरे बेटे ने मुझे गले लगाया और मुझे बताया कि वो मुझे कितना प्यार करता है और सच्चे दिल से मेरे लिए ज़न्नत चाहता है। इसके बाद उसने मुझे बताया कि उसे एक मुस्लिम माँ के अलावा ज़िन्दगी में सबकुछ मिला है। उसने कहा कि हर एक दिन वो अल्लाह से प्रार्थना करता है कि मैं इस्लाम धर्म कबूल कर लूँ। मैंने उससे कहा कि ऐसा कभी नहीं होगा।

सऊदी अरब में मैं अपनी बेटी से मिली और मुझे इस देश, इसके मौसम और यहाँ के लोगों से प्यार हो गया। 6 महीने के बाद मैं वापस नहीं जाना चाहती थी इसलिए मैंने अपना वीज़ा बढ़ाने का अनुरोध किया। मैं दिन में 5 बार अज़ान सुनती थी और आस्थावान लोगों को दुकानें बंद करके नमाज़ पढ़ने के लिए जाते हुए देखती थी। हालाँकि यह दिल को छूने वाला था फिर भी मैंने प्रत्येक सुबह और शाम बाइबिल पढ़ना जारी रखा और मैं लगातार प्रार्थना करती रहती थी। मेरी बेटी या अन्य किसी भी मुस्लिम ने मुझसे एक बार भी इस्लाम की बात नहीं की और ना ही मुझे बदलने की कोशिश की। वे मेरा सम्मान करते थे और उन्होंने मुझे अपने धर्म का पालन करने से कभी नहीं रोका।

मेरा बेटा मुझसे मिलने के लिए सऊदी अरब आने वाला था। मैं बहुत खुश थी–मैं उसे बहुत याद किया करती थी। आने के तुरंत बाद ही धर्म और अल्लाह की अखंडता को लेकर वो दोबारा मेरे पीछे पड़ गया। मैं गुस्सा हो गयी। मैंने उससे बताया कि सऊदी अरब में रहते हुए मुझे एक साल से ज्यादा का वक्त हो गया लेकिन किसी एक इंसान ने भी मुझसे धर्म के बारे में बात नहीं की। और उसने, यहाँ अपनी दूसरी रात में ही उपदेश देना शुरू कर दिया। उसने मुझसे माफ़ी मांगी और उसने दोबारा मुझे बताया कि वो कितना चाहता है कि मैं इस्लाम कबूल कर लूँ। मैंने उससे दोबारा बोला कि मैं कभी भी ईसाई धर्म नहीं छोडूंगी। उसने मुझसे ट्रिनिटी के बारे में पूछा और बोला कि मैं कैसे ऐसी किसी भी चीज पर भरोसा कर सकती हूँ जिसका कोई मतलब ही नहीं बनता। उसने मुझे याद दिलाया कि मेरे मन में भी इसके बारे में सवाल उठते हैं। मैंने उससे कहा कि हर बात का कोई मतलब निकलना जरुरी नहीं होता है–आपको केवल विश्वास करने की जरुरत होती है। ऐसा लगा जैसे उसने मेरे इस जवाब को स्वीकार कर लिया है और मैं खुश हुई कि आख़िरकार मैंने धर्म की चर्चा करते हुए एक बहस जीत ली। इसके बाद मेरे बेटे ने मुझे यीशु के चमत्कारों के बारे में उसे बताने के लिए कहा। मैं बहुत खुश हुई। अंत में मैं कहीं पहुँच रही थी। मैंने उसे यीशु के चमत्कारी जन्म, कुंवारी मैरी, हमारे पापों के लिए यीशु की मौत, उनके पुनर्जन्म, परमेश्वर के रूप में यीशु, परमेश्वर के बेटे के रूप में यीशु के बारे में बताया। इस दौरान पूरे समय तक वो चुप रहा–उसने किसी बात का खंडन नहीं किया–मेरा बेटा, बिल्कुल चुप था? इसके बाद उसने मुझसे पूछा, "माँ, यदि शुक्रवार को यीशु हमारे पापों के लिए मर गए थे और जैसा कि आपने बताया, तीन दिन बाद रविवार को उनका पुनर्जन्म हुआ तो इन तीन दिनों तक इस दुनिया को किसने चलाया? माँ, इसके बारे में मुझे बताओ?" मैंने इस सवाल के तर्क के बारे में सोचा और उस समय, मुझे पता था कि इस बात का कोई मतलब नहीं निकलता है।

मैंने कहा, "यीशु परमेश्वर के बेटे थे। यीशु और परमेश्वर एक ही हैं।" मेरे बेटे ने जवाब दिया, "गाय के बछड़े होते हैं; छोटी गाय। बिल्ली के बिलौटे होते हैं; छोटी बिल्लियाँ। इंसान के बच्चे होते हैं; छोटे इंसान। जब परमेश्वर का कोई बेटा है तो वो क्या हुआ? छोटा परमेश्वर? यदि ऐसा है तो क्या आपके दो परमेश्वर हैं?" फिर उसने पूछा, "माँ, क्या कभी आप परमेश्वर बन सकती हैं?" मैंने उससे कहा ये कैसा बेतुका सवाल है। इंसान कभी भी परमेश्वर नहीं बन सकते हैं। (अब मैं बेहद गुस्से में थी) इसके बाद उसने पूछा, "क्या यीशु एक इंसान थे?" मैंने जवाब दिया, "हाँ।" फिर उसने कहा "इसलिए, वो कभी भी परमेश्वर नहीं हो सकते।" परमेश्वर इंसान बन गए थे यह तथ्य भी बेतुका है। परमेश्वर का इंसानी विशेषताओं को धारण करना उनके लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं था क्योंकि इसका मतलब है कि रचयिता खुद अपनी रचना बन गया है। बहरहाल, रचना रचयिता के रचनात्मक कार्य का उत्पाद होती है। यदि रचयिता खुद अपनी रचना बन जाता है तो इसका मतलब होगा कि रचयिता ने खुद अपना निर्माण किया है, जो बिल्कुल अर्थहीन है। बनाया जाने के लिए, सबसे पहले उसका अस्तित्व नहीं होना जरुरी था, और, यदि उसका अस्तित्व नहीं था तो वो कैसे किसी की रचना कर सकता है? इसके अतिरिक्त, यदि उसकी रचना की गयी थी तो इसका मतलब होगा कि उसकी शुरुआत हुई थी, जो उसके अनंत होने की बात का विरोधाभाषी है। परिभाषा के अनुसार रचना को रचयिता की जरुरत होती है। बनायी गयी चीजों का मौजूद होने के लिए उन्हें अस्तित्व में लाने वाला रचयिता होना जरुरी होता है। परमेश्वर को रचयिता की जरुरत नहीं हो सकती क्योंकि वो खुद रचयिता होता है। इसलिए, इन तथ्यों में एक स्पष्ट विरोधाभास है। परमेश्वर का स्वयं अपनी रचना बनने का दावा दर्शाता है कि उन्हें रचयिता की जरुरत रही होगी, जो एक बेतुकी संकल्पना है। यह परमेश्वर के अनिर्मित होने, किसी रचयिता की जरुरत नहीं होने और स्वयं रचयिता होने के मूलभूत सिद्धांत का विरोध करता है। यह जानकर कि मेरे पास उसके लिए कोई जवाब नहीं है, मैंने कहा, "मुझे इसके जवाब के बारे में सोचने दो।"

उस शाम, मैंने अपने बेटे की कही गयी गयी बातों के बारे में बहुत गंभीरता से सोचा। यह तर्क कि यीशु परमेश्वर के बेटे हैं इसका अब मेरे लिए कोई मतलब नहीं बन रहा था। मैं इस तथ्य को भी स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि यीशु और परमेश्वर एक ही हैं। उस रात सोने से पहले, मेरे बेटे ने मुझे अल्लाह से प्रार्थना करने के लिए और मुझे सही रास्ता दिखाने के लिए उनकी मदद मांगने के लिए कहा। मैंने अपने बेटे से वादा किया कि मैं पूरी संजीदगी से अल्लाह से जवाब मांगने के लिए मिन्नत करुँगी। मैं अपने कमरे में गयी और मेरे बेटे ने जो किताबें मुझे दी थी मैंने उनमें से एक को पढ़ा। फिर, मैंने पवित्र क़ुरान उठाया और उसे पढ़ना शुरू किया। ऐसा लगा जैसे मेरे दिल से कोई बोझ उतर गया हो। मुझे कुछ अलग सा महसूस हुआ। मुझे इस्लाम में सच्चाई दिखी। मैं इतने सालों से किसके खिलाफ़ लड़ाई लड़ रही थी?

उस रात मैंने केवल अल्लाह से प्रार्थना की–मैंने यीशु, मैरी, देवदूतों या संतों या परमात्मा से प्रार्थना नहीं की। मैंने केवल अल्लाह को पुकारा और उनसे मुझे रास्ता दिखाने के लिए कहा। मैंने प्रार्थना कि यदि इस्लाम सही रास्ता है तो वो मेरे दिल और दिमाग को बदल दें। इसके बाद मैं सो गयी और अगली सुबह मैंने उठकर अपने बेटे से कहा कि मैं इस्लाम कबूल करने के लिए तैयार हूँ। वो आश्चर्यचकित हो गया। हम दोनों रोने लगे। मेरी बेटी और पोती को बुलाया गया और उन्होंने मुझे अरबी, इटैलियन और इंग्लिश में शहादा (अल्लाह की एकात्मकता और मोहम्मद (अल्लाह की शांति और आशीर्वाद अल्लाह के पैगम्बर के ऊपर होती है) को अल्लाह के पैगम्बर के रूप में मानने के विश्वास की मुस्लिम अभिव्यक्ति) पढ़ते हुए देखा।

أشهد أن لا إله إلاَّ الله و أشهد أن محمد رسول الله
"अश्हदु अला-ला इला-ह इल्लल्लाह अश्हदु अन-न मुहम्मदर रसूलुल्लाह"
"अल्लाह के सिवा कोई दूसरा खुदा नहीं है और मुहम्मद उनके सन्देशवाहक और आखिरी पैगम्बर हैं।"

शहादा अल्लाह की एकात्मकता और मोहम्मद (अल्लाह की शांति और आशीर्वाद अल्लाह के पैगम्बर के ऊपर होती है) को अल्लाह के पैगम्बर के रूप में मानने के विश्वास की मुस्लिम अभिव्यक्ति होती है। मैं खुद को अब एक अलग औरत महसूस कर रही थी। मैं खुश थी, जैसे किसी ने मेरे दिल से अँधेरे की काली चादर हटा दी हो। जो लोग भी मुझे जानते थे उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था कि मैंने इस्लाम कबूल कर लिया। कभी-कभी मुझे भी इस बात का यकीन नहीं हो पाता! लेकिन इस्लाम बेहद सच्चा, शांतिपूर्ण और साफ़ लगता है!

मेरे बेटे के अमेरिका वापस जाने के बाद मैंने अरबी में सूरा-अल-फ़ातिहा पढ़ना सीखा और इसके बाद से मैंने नमाज़ करना भी सीखा। मैंने पहले की तरह ही अपना जीवन वापस शुरू कर दिया; लेकिन अंतर केवल यह है कि अब मैं एक मुस्लिम हूँ। मुझे अपनी बेटी के साथ पारिवारिक समारोहों साथ ही सामाजिक कार्यक्रमों में शिरकत करना हमेशा से बेहद पसंद था। मैं परिवार और दोस्तों की शादी, हिना समारोह, अक़ीक़ा (गोदभराई) और किसी के मरने पर होने वाले समारोहों में हिस्सा लिया करती थी। मेरे इस्लाम धर्म में बदल जाने के लगभग 6 महीने बाद मैं एक जनाज़े में गयी थी जिसने सचमुच मेरे दिल को छू लिया और इस्लाम कितना खूबसूरत धर्म है इसपर मेरा विश्वास और भी ज्यादा मजबूत हो गया। बीमारी के कारण एक जवान लड़के की मौत हो गयी थी। जब मेरी बेटी मातम में जाने के लिए तैयार हो रही थी तो मैंने उससे पूछा कि क्या वो उनके परिवार को अच्छे से जानती है। उसने कहा कि वो उन्हें ठीक से नहीं जानती। मैंने कहा "फिर क्यों जा रही हो?" "क्योंकि उनका परिवार मातम में है और इस्लाम में ये मेरा फर्ज़ है कि मैं वहां जाऊं और जो भी मैं उनके लिए कर सकती हूँ करूँ।" मैंने भी तैयार होकर उसके साथ जाने का फैसला किया। उस लड़के के परिवार को सहानुभूति देने के लिए मैं अपनी बेटी के साथ वहां गयी और वहां इतने लोगों की संख्या को देखकर मैं अभिभूत हो गयी। उस परिवार को इतने सारे लोग सहारा देने आए थे यह देखकर मैं आश्चर्यचकित और भावुक हो गयी। जब मैंने उस परिवार को मातम मानते हुए देखा तो मैं बस इतना ही सोच पा रही थी कि इस्लाम कितना खूबसूरत धर्म है जो इतने सारे लोगों को यह लगता है कि उस परिवार को सहारा देना उनका फर्ज़ है। और वो कार्यक्रम, जहाँ मुस्लिम अपनी सहानुभूति को दिल खोलकर प्रकट कर रहे थे, वो एक पल था जिसने इस्लाम की खूबसूरती को साबित कर दिया था।

मुस्लिम बने हुए अब मुझे आठ साल हो गए हैं, अल्हम्दुलिल्लाह। उस समय से, मैंने अपने बेटे और बेटी के साथ दो बार उमरा किया है। मैं, मेरा बेटा और बेटी काबा (मक्का, सऊदी अरब के शहर में) और मदीना में पवित्र पैगम्बर के मस्जिद गए। मैंने हाल ही में अपना 75वाँ जन्मदिन मनाया है अल्हम्दुलिल्लाह। कभी- कभी मैं उन सभी कठिनाइयों और दुःख के बारे में सोचती हूँ जो मेरी वजह से मेरे बेटे को सहने पड़े होंगे, लेकिन मेरा बेटा मुझे इस्लाम में लाने का माध्यम बनकर बहुत खुश था। फिर उसने कहा कि पैगम्बर (SAW) ने एक आदमी से कहा था कि, "ज़न्नत माँ के पैरों में होती है"। इस कहावत का मतलब है कि आपको अपनी माँ की सेवा करनी चाहिए और उनकी अच्छे से देखभाल करनी चाहिए। मेरे पैरों में रहने पर यह निश्चित है कि हम दोनों को ही ज़न्नत नसीब होगी। मैं यह भी सोचती हूँ कि यदि मेरी बेटी ने मुझपर थोड़ा दबाव डाला होता तो शायद मैं जल्दी ही मुस्लिम बन गयी होती। लेकिन मेरे बेटे ने मुझे याद दिलाया कि अल्लाह सबसे अच्छा योजनाकार होता है। और केवल वही (SWT) है जो किसी इंसान को हिदाया (मार्गदर्शन) दे सकता है। "असल में ऐसा नहीं है कि आप जिसे प्यार करते हैं उसको रास्ता दिखा सकते हैं बल्कि वो अल्लाह है जो अपनी मर्ज़ी से किसी को भी रास्ता दिखा सकता है।" (क़ुरान 28:56)। सबसे अच्छी बात यह है कि अल्लाह ने मुझे इस्लाम के रास्ते पर मेरा मार्गदर्शन करके और मुझे मुस्लिम बनाकर, और इंशाल्लाह अपने बेटे के साथ ज़न्नत में जाने की इज्जत से नवाज़ा है।
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